क्या आपने कभी सोचा है कि माओवादीय आंदोलन भारत में क्यों उभरा? यह सवाल अक्सर पूछे जाता है, खासकर जब खबरों में नक्सल या सशस्त्र विद्रोह की बातें आती हैं। सरल शब्दों में कहें तो, माओवादी आंदोलन एक ऐसी राजनीति है जो गरीब और शोषित वर्ग को उठाने के लिए हथियारबंद संघर्ष अपनाती है। इसका आधार चीनी कम्युनिस्ट नेता माओ ज़ेदोंग की विचारधारा पर बना है, इसलिए इसे ‘माओवाद’ कहा जाता है।
1960‑70 के दशक में भारत में बहुत सारी सामाजिक समस्याएँ थीं – भूमि का अतिरेक, किसान की बेइज़्ज़ती, बेरोजगारी और शोषण। इन परेशानियों को देखते हुए कुछ युवाओं ने माओ की विचारधारा को अपनाया और सशस्त्र संघर्ष शुरू किया। पहली बार 1967 में ‘नक्सल’ नामक जगह (ज्यादातर छत्तीसगढ़) में उनका बुनियादी क़दम पड़ा, इसलिए इन्हें नक्सली कहा गया। इस समय उन्होंने खुद को ‘जनता की सेना’ बताया और गाँव‑गाँव में जाकर किसानों के हक़ों की बात करने लगे।
अब यह आंदोलन सिर्फ एक या दो राज्यों तक सीमित नहीं रहा। अभी भी छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, बिहार और तेलंगाना में सक्रिय समूह मौजूद हैं। उनकी प्रमुख मांगें अब भी भूमि सुधार, शोषण समाप्ति और सच्ची लोकतांत्रिक व्यवस्था की है। सरकार ने कई बार ‘सामाजिक पुनरुद्धार’ के नाम पर कार्यक्रम चलाए, लेकिन अक्सर इन प्रयासों को विरोधियों ने असफल माना।
समय‑समय पर दहशतवादियों द्वारा हमले होते रहे हैं – स्कूल, पुलिस पोस्ट और सरकारी भवन लक्ष्य बनते रहे हैं। इससे आम जनता की सुरक्षा में बड़ी चूक हुई है, लेकिन साथ ही विकास के काम भी रुकते दिखे हैं। इसलिए कई लोग कहते हैं कि इस संघर्ष को सुलझाने में सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों का निर्माण ज़रूरी है।
सरकार ने ‘सुरक्षा‑विकास’ योजना शुरू की, जिसमें नक्सली इलाक़ों में सड़क, स्कूल और अस्पताल बनाकर लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने की कोशिश की जा रही है। अभी तक इसका असर सीमित दिख रहा है, पर अगर सही तरह लागू किया जाए तो भविष्य में इस आंदोलन का अंत संभव हो सकता है।
आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कुछ क्षेत्रों में माओवादी समूह अब राजनीति में भी शामिल होने लगे हैं – वे चुनावों में अपने समर्थन के बदले विकास के वादे लेते हैं। इससे संघर्ष की परिधि बदल रही है, और यह सिर्फ सशस्त्र टकराव नहीं रह गया, बल्कि सामाजिक संवाद का रूप ले रहा है।
अगर आप इस विषय को गहराई से समझना चाहते हैं तो नीचे कुछ आसान टिप्स अपनाएँ:
अंत में यह कह सकते हैं कि माओवादी आंधोलन सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता की जाँच भी है। इसे समझने के लिए हमें जमीन स्तर पर लोगों की ज़रूरतें और सरकार की नीति दोनों को देखना होगा। सही समाधान तभी मिलेगा जब आर्थिक विकास, शिक्षा और सुरक्षा का संतुलन बने।
राहुल पंडिता ने प्रोफेसर जी एन साईबाबा के साथ अपने अनुभवों और उनसे मिले सबक को साझा किया है। साईबाबा, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर, आदिवासी समुदायों की समस्याओं और माओवादी आंदोलन में उनकी भूमिका के लिए जाने जाते हैं। पंडिता ने साईबाबा के माध्यम से माओवादी नेताओं और उनके परिवारों की कहानियों को समझा और देखा कि कैसे राज्य की नीतियों ने आदिवासियों के जीवन को प्रभावित किया है।