जी एन साईबाबा से सीखे गए सबक: राहुल पंडिता की यात्रा

जी एन साईबाबा से सीखे गए सबक: राहुल पंडिता की यात्रा

जी एन साईबाबा: एक परिचयात्मक दृष्टिकोण

प्रोफेसर जी एन साईबाबा, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्राध्यापक, जिन्होंने अपने जीवन के कई वर्षों को एक कठिन कारावास के तहत बिताया, अपनी विरासत और अनुभवों के माध्यम से एक गहरा प्रभाव छोडते हैं। हाल ही में, उनकी रिहाई और उसके बाद हुए घटनाक्रमों ने भारतीय न्याय प्रणाली पर पुनर्विचार की आवश्यकता पर बल दिया है। राहुल पंडिता, एक प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार, ने साईबाबा के साथ अपने अनुभवों, उनसे सीखे गए सबक, और भारतीय समाज के विभिन्न पहलुओं के प्रति उनकी समझ को साझा किया है।

राहुल पंडिता का साईबाबा से मिलना

राहुल पंडिता का साईबाबा से मिलना

राहुल पंडिता के लिए जी एन साईबाबा के साथ की गई पहली मुलाकात एक यादगार अनुभव थी। यह मुलाकात दिल्ली विश्वविद्यालय के ग्वायर हॉल छात्रावास में हुई थी, जहां उनसे मिलने जाने पर पंडिता ने साईबाबा के विचारशील व्यक्तित्व और विद्वत्ता का अनुभव किया। यह समय भारतीय राजनीति और समाज के बीच एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था, और साईबाबा के विचारों ने इस परिवर्तन को समझने में गहरी अंतर्दृष्टि प्रदान की।

माओवादी आंदोलन के दिल में यात्रा

2007-08 के आसपास, पंडिता ने दंतेवाड़ा और बस्तर जैसे क्षेत्रों का दौरा किया, जो माओवादी आंदोलन के गढ़ माने जाते हैं। इस यात्रा ने राहुल को एक अलग दृष्टिकोण से समाज के उस वर्ग की समस्याओं और संघर्षों को समझने का मौका दिया, जिन्हें समाज ने लंबे समय से नजरअंदाज किया था। इस यात्रा के दौरान साईबाबा ने पंडिता को कई महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों से परिचित करवाया, जिनमें वकील सुरेंद्र गडलिंग भी शामिल हैं। गडलिंग, जिन्होंने कई चुनौतियों का सामना किया लेकिन आज भी जेल में बंद हैं, भी माओवादी आंदोलन के बारे में एक महत्वपूर्ण कथा प्रस्तुत करते हैं।

आदिवासी समुदायों के साथ अनुभव

आदिवासी समुदायों के साथ अनुभव

राहुल पंडिता को उन परिवारों से भी मिलने का अवसर मिला जिनके प्रिय माओवादी संघर्ष में शहीद हुए थे, जैसे कि पेड्डी शंकर और गज्जल गंगा राम। इन मुलाकातों से पंडिता को समझ आया कि वर्षों के बाद भी इन परिवारों की जीवन स्थितियों में बहुत कम परिवर्तन आया है। इन कहानियों ने राहुल को यह अहसास दिलाया कि कैसे आदिवासी समुदायों को एक गहरे अन्यायपूर्ण तंत्र में धकेला गया है, जहां उनकी आवाजें दबा दी जाती हैं और उनके अधिकारों के लिए लड़ाई एक लंबा और कठिन रास्ता साबित होती है।

न्यायिक प्रणाली और उसकी भूमिका

राहुल पंडिता ने अपने लेख में यही आशा व्यक्त की है कि जी एन साईबाबा की रिहाई के बाद न्यायिक प्रणाली अपना दृष्टिकोण बदले और ऐसे कई अन्य लोगों को न्याय दिला सके, जिन्हें अवैध रूप से कारावास में रखा गया है। राहुल ने उम्मीद जताई है कि साईबाबा की कहानी न्यायपालिका में सुधार की दिशा में एक प्रेरणा बनेगी और सुरेंद्र गडलिंग और उमर खालिद जैसे अन्य लोगों की रिहाई का मार्ग प्रशस्त करेगी।

आशा की किरण

आशा की किरण

राहुल पंडिता का यह लेख केवल व्यक्तिगत अनुभवों का जिक्र नहीं करता, बल्कि एक व्यापक समाजिक मुद्दे को भी उठाता है। यह लेख उन कहानियों को उजागर करता है जिन्हें सामान्य तौर पर दबा दिया जाता है और उन लोगों की आवाज बनता है जो अपने अधिकारों के लिए लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं। पंडिता ने अपने अनुभवों से जो शिक्षा प्राप्त की है, वह न केवल उनके लिए व्यक्तिगत रूप से महत्वपूर्ण है, बल्कि व्यापक समाज के लिए भी विचारणीय है।

6 Comments

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    Arun Kumar

    अक्तूबर 15, 2024 AT 10:22

    ये सब बकवास है! जी एन साईबाबा को कारावास में रखना गलत था? तो फिर माओवादियों के खूनी कारनामों का क्या? ये लोग बच्चों को बंदूक सौंप देते हैं, गाँव जला देते हैं, और अब ये सब कहानियाँ सुनाकर अपनी बदली बनाने की कोशिश कर रहे हैं। न्याय का मतलब ये नहीं कि आतंकवादी को शहीद बना दिया जाए।

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    Snehal Patil

    अक्तूबर 16, 2024 AT 12:58

    OMG 😭 ये कहानी तो मेरे दिल को चीर गई! राहुल ने जो बताया वो तो बिल्कुल जबरदस्त है 🥹 और गडलिंग जी जैसे लोग अभी भी जेल में हैं?! 😡 ये देश कैसे चल रहा है?! #JusticeForGadling #SaiBabaIsAHero 💔🫂

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    Vikash Yadav

    अक्तूबर 16, 2024 AT 13:10

    भाई ये लेख तो ज़बरदस्त लगा! 🤯 जी एन साईबाबा की जिंदगी का हर पल एक सबक है - जेल में बैठे बैठे दिमाग नहीं बंद किया, बल्कि समाज को समझने की कोशिश की। ये आदिवासियों की कहानियाँ जो लेखक ने बाँटीं, वो सिर्फ़ एक लेख नहीं, ये तो एक जीवन बदलने वाला अनुभव है। देश को ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो बाहर से नहीं, अंदर से देखते हैं।

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    sivagami priya

    अक्तूबर 17, 2024 AT 23:16

    वाह! ये लेख तो मैंने एक बार पढ़कर दोबारा पढ़ लिया! 🙌 अगर ये बातें सिर्फ़ लेख में ही रह गईं तो ये बेकार है - इसे टीवी पर, स्कूलों में, यूनिवर्सिटी में दिखाया जाना चाहिए! साईबाबा का दर्शन तो बहुत गहरा है - दर्द को समझना, बिना गुस्से के बात करना, और न्याय की आवाज़ बनना - ये तो असली शिक्षा है! 💪❤️

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    Anuj Poudel

    अक्तूबर 18, 2024 AT 08:49

    इस लेख को पढ़कर मुझे एक सवाल आया - क्या हम समाज में अपने न्याय प्रणाली को बदलने के बजाय, बस इन लोगों को दुष्ट बना देते हैं? क्योंकि जब तक हम आदिवासियों की ज़मीन, जीवन, भाषा, और संस्कृति को नहीं समझेंगे, तब तक ये आंदोलन बस दबाव का नतीजा होते रहेंगे। गडलिंग और साईबाबा जैसे लोगों को दुश्मन नहीं, शिक्षक मानना चाहिए।

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    Aishwarya George

    अक्तूबर 18, 2024 AT 08:57

    यह लेख एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ है। राहुल पंडिता ने एक अत्यंत संवेदनशील और जटिल सामाजिक संघर्ष को बिना धुंधलाए, बिना अतिशयोक्ति के, और बिना किसी राजनीतिक झंडे के पेश किया है। जी एन साईबाबा की रिहाई केवल एक व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि एक न्यायपालिका के लिए एक परीक्षण है। यदि यह न्याय की आवाज़ बन जाती है, तो सुरेंद्र गडलिंग, उमर खालिद, और लाखों अनजान नामों के लिए एक नई शुरुआत हो सकती है। यह लेख नहीं, यह एक आह्वान है।

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