जब पहाड़ी या ढलान वाली जमीन अचानक गिरती है तो उसे भूस्खलन कहते हैं। यह सिर्फ धूप-छाया की बात नहीं, बल्कि पानी, हवा और भू‑स्थिरता में बदलाव का नतीजा होता है। रोज़मर्रा में हम कभी सोचे बिना ऐसे क्षेत्रों से गुजरते हैं, लेकिन अगर ठीक से तैयार रहें तो नुकसान कम किया जा सकता है।
1. **अधिक बारिश** – लगातार भारी वर्षा मिट्टी को पानी से भर देती है और हल्का बनाती है। जब जल‑दाब बढ़ता है, तो जमीन टूटना शुरू करती है।
2. **भारी बवंडर या तेज़ हवा** – तेज़ हवाएँ सतह की मिट्टी को उड़ा सकती हैं, खासकर अगर वह पहले से कमजोर हो।
3. **मानवी गतिविधि**: सड़क निर्माण, खनन और अनियंत्रित कटाई ढलानों की स्थिरता बिगाड़ते हैं। जब पेड़ हटाते हैं तो जड़ों का समर्थन नहीं रहता और मिट्टी आसानी से फिसलती है।
4. **भू‑स्थलीय कारण**: कुछ क्षेत्रों में चट्टानें पहले से ही दरारों वाली होती हैं, जिससे भूस्खलन की संभावना बढ़ जाती है।
भूस्खलन आने से पहले अक्सर छोटे‑छोटे संकेत दिखते हैं: ढलान पर दरारें बनना, पेड़ों का झुकना, ध्वनि में बदलाव या जमीन की सतह पर पानी के बड़े गड्ढे। अगर इन बातों को देखें तो तुरंत ये कदम उठाएँ:
भूस्खलन के बाद मदद की ज़रूरत वाले लोगों को प्राथमिक उपचार देना, बचाव दल को तुरंत सूचित करना सबसे जरूरी काम है। मोबाइल या स्थानीय पुलिस का नंबर याद रखें।
**रोकथाम के आसान उपाय** भी अपनाए जा सकते हैं:
अंत में, याद रखें कि भूस्खलन एक प्राकृतिक आपदा है लेकिन सही तैयारी और सावधानी से उसके असर को बहुत हद तक घटाया जा सकता है। अगर आपके इलाके में लगातार भारी बारिश होती है तो स्थानीय समाचार चैनलों पर अपडेट देखना न भूलें। सुरक्षित रहें, सतर्क रहें!
केरल के वायनाड जिले के मेप्पाडी के निकट पहाड़ी क्षेत्रों में 30 जुलाई, 2024 को भूस्खलन ने भारी विनाश मचाया, जिसमें कम से कम 106 लोगों की मृत्यु हो गई। सैकड़ों अन्य लोगों के फंसे होने का संदेह है, और बचाव अभियान में लगातार बारिश की वजह से रुकावटें आ रही हैं। केरल राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (KSDMA) ने प्रभावित क्षेत्र में फायरफोर्स और एनडीआरएफ टीमों को तैनात किया है, जबकि अतिरिक्त टीमें भी भेजी रही हैं।